तलाक के कारण और ज्योतिष में उपाय

By Pt. Dayanand Shastri (Astro & Vastu Consultant )

हमारे हिन्दू संस्कारों में विवाह को जीवन का आवश्यक संस्कार बताया गया है. Vivah के योग प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में होते हैं लेकिन कुछ ऐसे कारक हैं जो उसमें विलंब कराते हैं.

ज्योतिषशास्त्र में मंगल, शनि, सूर्य, राहु और केतु को विलंब का कारक बताया गया है.

जन्मकुंडली के सप्तम भाव-Saptam Bhav में अशुभ या क्रूर ग्रह के स्थित होने अथवा सप्तमेश व उसके कारक ग्रह बृहस्पति व शुक्र के कमजोर होने से विवाह में बाधा आती है.

आम बोलचाल के शब्दों में कहें तो अगर आपके जीवन में विवाह का योग पैदा करने वाले ग्रहों के मुकाबले वे ग्रह ज्यादा हावी हैं जो विवाह योग को रोकते हैं, तो विवाह में बाधा आती है.

आज लगभग लोग वैवाहिक समस्या से ग्रस्त है। किसी को विवाह होने में रूकावट का सामना करना पङता है तो कुछ विवाह बाद के वैचारिक मतभेदों से पीङित है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सबसे पहले हमें देखना होगा कि कौनसे योग है जो विवाह होने में बाधा देते है और कौनसे योग वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देते है।

कुंडली में सप्तम भाव केंद्र भावों में से एक है। इसे जाया, कलत्र, काम, भार्या आदि नामों से भी पुकारा जाता है। फारसी में इस भाव को हफ्तमखाने, जनखाने, हमलखाने कहते हैं।

लग्न भाव जीवन व जीवनारंभ दर्शाता है तो सप्तम भाव लग्न के विपरीत होने से जीवन का अंत दर्शाता है। इसलिए इसका एक नाम अस्त भी है क्योंकि लग्न उदय स्थान है।

जीवन के चार प्रमुख कार्यों यथा- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष में से काम का विचार सप्तम भाव से किया जाता है।

प्रत्येक मनुष्य को जीवन में सहयोगी की आवश्यकता होती है। सर्वश्रेष्ठ सहयोगी पति या पत्नी होती है। इसलिए पत्नी या पति का विचार भी इसी भाव से किया जाता है।

जीवन साथी के अतिरिक्त विवाह, कामकला, दांपत्य सुख, विवाह का समय, साझेदारी, व्यापार, जीवनसाथी की विशेषताएं, मैथुन आदि का विचार इसी भाव से किया जाता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि दशम भाव(कर्म स्थान) से दशम होने के कारण सप्तम भाव से कार्यक्षेत्र व व्यवसाय का विचार भी किया जाता है।

पंचम भाव से तृतीय होने के कारण यह भाव पुत्र के पराक्रम तथा व्यक्ति की द्वितीय संतान का प्रतीक भी है। चतुर्थ से चतुर्थ होने के कारण यह भाव नानी तथा ननिहाल को भी दर्शाता है।

समझें कुछ मुख्य कारण—

  1. यदि कुंडली में सातवें घर का स्वामी सप्तमांश कुंडली में किसी भी नीच ग्रह के साथ अशुभ भाव में बैठा हो तो शादी तय नहीं हो पाती है.
  2. यदि दूसरे भाव का स्वामी अकेला सातवें घर में हो तथा शनि पांचवें अथवा दशम भाव में वक्री अथवा नीच राशि का हो तो शादी तय होकर भी टूट जाती है.
  3. यदि जन्म समय में श्रवण नक्षत्र हो तथा कुंडली में कही भी मंगल एवं शनि का योग हो तो शादी तय होकर भी टूट जाती है.
  4. यदि मूल नक्षत्र में जन्म हो तथा गुरु सिंह राशि में हो तो भी शादी तय होकर टूट जाती है. किन्तु गुरु को वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए.
  5. यदि जन्म नक्षत्र से सातवें, बारहवें, सत्रहवें, बाईसवें या सत्ताईसवें नक्षत्र में सूर्य हो तो भी विवाह तय होकर टूट जाता है.

जानिए तलाक क्यों होता हें?- Reason Of Talak In Astrology.

  1. यदि कुंडली मांगलीक होगी तो विवाह होकर भी तलाक हो जाता है. किन्तु ध्यान रहे किसी भी हालत में सप्तमेश को वर्गोत्तम नहीं होना चाहिए.
  2. दूसरे भाव का स्वामी यदि नीचस्थ लग्नेश के साथ मंगल अथवा शनि से देखा जाता होगा तो तलाक हो जाएगा. किन्तु मंगल अथवा शनि को लग्नेश अथवा द्वितीयेश नहीं होना चाहिए.
  3. यदि जन्म कुंडली का सप्तमेश सप्तमांश कुंडली का अष्टमेश हो अथवा जन्म कुंडली का अष्टमेश सप्तमांश कुंडली का लग्नेश हो एवं दोनों कुंडली में लग्नेश एवं सप्तमेश अपने से आठवें घर के स्वामी से देखे जाते हो तो तलाक निश्चित होगा.
  4. यदि पत्नी का जन्म नक्षत्र ध्रुव संज्ञक हो एवं पति का चर संज्ञक तो तलाक हो जाता है. किन्तु किसी का भी मृदु संज्ञक नक्षत्र नहीं होना चाहिए.
  5. यदि अकेला राहू सातवें भाव में तथा अकेला शनि पांचवें भाव में बैठा हो तो तलाक हो जाता है. किन्तु ऐसी अवस्था में शनि को लग्नेश नहीं होना चाहिए. या लग्न में उच्च का गुरु नहीं होना चाहिए.

शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते(पति पत्नी में अलगाव के ज्योतिषीय कारण )—
ज्योतिषीय नियम है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है।

जैसे, मानसागरी में वर्णन है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है। किन्तु, विडंबना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक है, वैवाहिक सुख के लिए दूषित सिद्ध हुआ हैं।

यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, मगर कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता है। सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से संबन्धित सुखों की हानि करता है।

प्राय: शनि को विलंबकारी माना जाता है, मगर स्त्रियों की कुंडली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलंब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की संभावना ही न्यून होती है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते है कि यदि ऐसी स्थिति में विवाह हो जाये तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता हैं।

वैद्यनाथ ने जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है, ‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है।

कर्क लग्न की कुंडलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है। व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुंडली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं।

एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है।

सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है। यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं।

चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं। दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला।

पुरुषों की कुंडली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है। यदि इसके संग शनि और केतु की युति हो तो नपुंसकता का परिमाण बढ़ जाता है।पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है।

सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है।

‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तो मनुष्य की स्त्री पति और कुल की नाशक होती है।’’सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान हैं।

चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक है। चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता है।

दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है। अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन संबन्धों का कारक बनता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि शुक्र -मिथुन या कन्या राशि में हो या इसके संग कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध और राहु हो, तो शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन संबन्धों की उत्पत्ति करती है।

ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धांतप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ नहीं होते बल्कि चंचल, चरित्रहीन, अस्थिर बुद्धि, अविश्वासी, व्यवहारकुशल मगर शराब, शबाब, कबाब, और सौंदर्य प्रधान वस्तुओं पर अपव्यय करने वाले होते हैं।

क्या ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन सुखी रह सकता है? कदापि नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों की भांति शुभ ग्रहों वष स्थिति से वैवाहिक सुख नष्ट होते हैं।

यदि कुंडली में बारहवें शुक्र तथा तीसरे उच्च का चन्द्रमा हो तो चरित्र भ्रष्ट होता है।

यदि सातवें मंगल तथा शुक्र एवं पांचवें शनि हो तो चरित्र दोष होता है।

नवमेश नीच तथा लग्नेश छठे भाव में राहू युक्त हो तो निश्चित ही चरित्र दोष होता है।

आर्द्रा, विशाखा, शतभिषा अथवा भरनी नक्षत्र का जन्म हो तथा मंगल एवं शुक्र दोनों ही कन्या राशि में हो तो अवश्य ही पतित चरित्र होता है।

कन्या लग्न में लग्नेश यदि लग्न में ही हो तो पंच महापुरुष योग बनता है. किन्तु यदि इस बुध के साथ शुक्र एवं शनि हो तो नपुंसकत्व होता है।

यदि सातवें राहू हो तथा कर्क अथवा कुम्भ राशि का मंगल लग्न में हो तो या लग्न में शनि-मंगल एवं सातवें नीच का कोई भी ग्रह हो तो पति एवं पत्नी दोनों ही एक दूसरे को धोखा देने वाले होते है।

समझें सातवें भाव का अर्थ- What Is Saptam Bhav In Kundali?

जन्म कुन्डली का सातंवा भाव विवाह पत्नी ससुराल प्रेम भागीदारी और गुप्त व्यापार के लिये माना जाता है।

सातवां भाव अगर पापग्रहों द्वारा देखा जाता है,उसमें अशुभ राशि या योग होता है,तो स्त्री का पति चरित्रहीन होता है,स्त्री जातक की कुंडली के सातवें भाव में पापग्रह विराजमान है,और कोई शुभ ग्रह उसे नही देख रहा है,तो ऐसी स्त्री पति की मृत्यु का कारण बनती है।

परंतु ऐसी कुंडली के द्वितीय भाव में शुभ बैठे हों तो पहले स्त्री की मौत होती है,सूर्य और चन्द्रमा की आपस की दृष्टि अगर शुभ होती है तो पति पत्नी की आपस की सामजस्य अच्छी बनती है,और अगर सूर्य चन्द्रमा की आपस की १५० डिग्री,१८० डिग्री या ७२ डिग्री के आसपास की युति होती है तो कभी भी किसी भी समय तलाक या अलगाव हो सकता है।

यदि कुंडली में केतु और मंगल का सम्बन्ध किसी प्रकार से आपसी युति बना ले तो वैवाहिक जीवन आदर्शहीन होगा,ऐसा जातक कभी भी बलात्कार का शिकार हो सकता है,स्त्री की कुंडली में सूर्य सातवें स्थान पर पाया जाना ठीक नही होता है,ऐसा योग वैवाहिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है,केवल गुण मिला देने से या मंगलीक वाली बातों को बताने से इन बातों का फ़ल सही नही मिलता है,इसके लिये कुंडली के सातंवे भाव का योगायोग देखना भी जरूरी होता है।

सातवां भाव और पति पत्नी—-
सातवें भाव को लेकर पुरुष जातक के योगायोग अलग बनते है,स्त्री जातक के योगायोग अलग बनते है,विवाह करने के लिये सबसे पहले शुक्र पुरुष कुंडली के लिए और मंगल स्त्री की कुन्डली के लिये देखना जरूरी होता है,लेकिन इन सबके बाद चन्द्रमा को देखना भी जरूरी होता है,मनस्य जायते चन्द्रमा,के अनुसार चन्द्रमा की स्थिति के बिना मन की स्थिति नही बन पाता है।

पुरुष कुंडली में शुक्र के अनुसार पत्नी और स्त्री कुंडली में मंगल के अनुसार पति का स्वभाव सामने आ जाता है।

कैसा रहेगा वेवाहिक जीवन?

सप्तमेश का नवमेश से योग किसी भी केंद्र में हो तथा बुध, गुरु अथवा शुक्र में से कोई भी या सभी उच्च राशि गत हो तो दाम्पत्य जीवन बहुत ही मधुर होता है।

आगे पीछे ग्रहों से घिरे केंद्र में गज केसरी योग हो तथा आठवें कोई भी ग्रह नहीं हो तो वैवाहिक जीवन बहुत ही मधुर होता है।

भले ही कुंडली मांगलिक हो, यदि पंच महापुरुष योग बनाते हुए शुक्र अथवा गुरु से किसी कोण में सूर्य हो तो दाम्पत्य जीवन उच्च स्तरीय होता है।

भले ही कुंडली मांगलिक हो, यदि सप्तमेश उच्चस्थ होकर लग्नेश के साथ किसी केंद्र अथवा कोण में युति करे तो दाम्पत्य जीवन सुखी होता है।

भले गुरु नीच का सातवें भाव में तथा नीच का मंगल लग्न में हो, यदि छठे, आठवें तथा बारहवें कोई ग्रह न हो, तथा किसी भी ग्रह के द्वारा पंच महापुरुष योग बनता हो तो वैवाहिक जीवन सुखी होता है…

क्यों होती हैं हानि रात्रि काल मे विवाह से

हमारे अधिकतर विवाहो के सम्बन्ध विच्छेदो का कारण हे हमारे रात्री काल मे विवाह के करने का प्रचलन होना हे।

जबकि सनातन काल मे भी ओर हमारे भगवानो के विवाह जेसे-शिव सती व शिव पार्वती का विवाह दिन मे हुये थे तथा सारे शुभ एवम धार्मिक कार्य दिन मे ही करने ओर कराने के विधान हे।

रात्रिकाल मे निशाचरो का प्रहर माना गया हें ओर इस निशाचर काल मे किया गया विवाह ओर विवाह यग्य कर्मो मे जपे गये मन्त्रो से देवताओ का भोग निशाचरो को प्राप्त होता हे ओर निशाचरो का आवाहन होने से निशाचरो द्वारा विवाह के फ़ेरो मे वर वधु के साथ बन्ध जाने ओर उनके साथ साथ रहने का निशाचरी सम्बंध का प्रबल योग बन जाता है।

यही निशाचरी ग्रहण योग हमारे विवाहो की असफ़लताओ भरा जीवन व निशाचरी प्रभाव लिये हमारी सन्तानो का ना होना या हो कर मर जाना या सन्तानो की शिक्षा मे उनकी नोकरी रोजगार मे विघ्न होना या ज्योतिष के कालसर्प पित्र दोष आदि अनेक दोषो से हमारा व हमारी सन्तानो का दुखद भविष्य की प्राप्ति होती हे।

हम प्राचीन सनातनी होकर भी अपने सारे धर्म सिद्दान्त भूल गये हे ओर कलियुग के निशाचरी प्रभाव वश हो कर वेभव की चकाचोध मे अपना सूर्य देव का सात्विक आशिर्वाद लेने कि जगह रात्रि का निशाचरी शाप ले कर अशुभ दुखद जीवन क्यो जीना चाह रहे हे।

आजकल प्री वेडिंग शेषन का प्रचलन भी बहुत गलत संदेश ओर प्रभाव दे रहा हें।

अन्य मुसलिम ईसाई सिख्ख आदि धर्मो मे आज भी अधिकतर विवाह दिन मे ही होते हे। ये नही कि वे सब सुखी हे परन्तु विवाह मे दुख का कारण ये तो हे ही साथ मे सही रुप से विवाह मन्त्रो का सही उच्चारण का न होना व सनातन विवाह मे अधकचरापन को अपनाना भी है।

विवाह के पूर्व किन चीजो का ध्यान रखें:-

एक ज्योतिषीय परामर्श….
रूप, सौंदर्य, स्वास्थय, स्तर तथा गणना आदि सब तरह से जब आश्वस्त हो जाएँ तो कृपया निम्न बातो को आवश्यक रूप से जांच लें-

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लडके एवं लड़की दोनों का जन्म एक दूसरे के तृतीयांत राशि में न हो। अर्थात यदि लडके का जन्म मेष राशि के अंत में अर्थात कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण में हो तो लड़की का जन्म मिथुन राशि के अंत अर्थात पुनर्वसु नक्षत्र के अंतिम चरण में नहीं होना चाहिये।

कुंडली में लडके के जिस भाव में सूर्य हो लड़की की कुंडली में उस भाव में गुरु न होवे।

लड़की के जिस भाव में मंगल हो लडके की कुंडली में उस भाव में शुक्र न होवे।

लडके की कुंडली में यदि आठवें भाव में शनि, राहु, मंगल या सूर्य हो तो लड़की की कुंडली में इसी भाव में इनमें से कोई भी ग्रह उस शर्त पर हो जो लडके के अष्टक वर्ग में आठवें भाव में 4 या इससे कम अंक लिया हो। अन्यथा अल्पायु योग स्वतः बन जायेगा।

विवाह का मुहूर्त तभी निकालें जब लड़का या लड़की किसी एक का किसी भी ग्रह में राहु की अन्तर्दशा चल रही हो। तथा दूसरे की सप्तम या दूसरे भाव की संध्या दशा में पाचक दशा चल रही हो। ऐसा इसलिये ताकि आजीवन एक की दशा विपरीत होने पर दूसरे की दशा बली होकर उसे सहारा दे देती है।

पारंपरिक गणना के अनुसार यदि नाडी एक हो जाती है। तो शादी निषिद्ध कर दी जाती है। कारण यह है की एक तो गणना में सीधे आठ अंक कम हो जाते है। दूसरे वंश क्रम अवरुद्ध होने का कथन है। किन्तु यदि दोनों की कुंडली में पंचमेश, सप्तमेश एवं लग्नेश दोनों के पांचवें भाव की राशि में 5 या इससे अधिक अंक पाते है। तो वंशक्रम अवरुद्ध नहीं हो पाता है।

केवल मांगलिक योग शादी में 20% ही बाधक बन सकता है। वह भी तब जब अष्टमेश एवं द्वादशेश दोनों के अष्टम एवं द्वादश भाव में 5 या इससे अधिक अंक पाते है।

यदि लग्नेश, सप्तमेश एवं पंचमेश सप्तम भाव में 5 या इससे अधिक पाते है, तथा इनमें से कोई अस्त या नीच का न हो तो लड़का-लड़की दोनों आजीवन सुखी एवं खुश रहेगें। चाहे कुंडली कितनी भी भयंकर मांगलीक क्यों न हो।

दोनों के सप्तमांश कुंडली में सप्तमेश परस्पर शत्रु ग्रह नहीं होने चाहिये। यदि संयोग से ऐसा हो भी जाता है, तो शादी के समय उस नक्षत्र में विवाह कदापि न करें जिसमे जन्म के समय दोनों के सप्तमेश हो।

यदि सप्तम भाव में प्रत्येक ग्रह को 5 या इससे अधिक मिलें तो गणना न मिलने पर भी शादी सदा शुभ होगी।

इसके विपरीत यदि गणना के अंक 25 या 30 या इससे अधिक ही क्यों न मिलें, किन्तु अष्टक वर्ग में यदि प्रत्येक ग्रह को 3 या इससे कम अंक मिलते हो, तो वह विवाह सदा ही अशुभ होता है।

यदि भाव दोष के कारण विवाह में बाधा पहुँच रही हो तो पहले नक्षत्र व्युत्क्रमण की विधि पूरी करें। यदि नक्षत्र दोष के कारण बाधा हो तो स्थान व्युत्क्रमण की विधि पूरी करें। किन्तु यदि दोनों दोष हो तो विवाह किसी भी कीमत पर न करें।

और अंत में मैं पण्डित दयानन्द शास्त्री सभी पाठकों से यह कहना चाहूंगा कि ये सारे प्रतिबन्ध या सम्मति सिर्फ उनके लिए लागू है जो ज्योतिष, गणना या इस परम्परा को मानते हैं। जो नहीं मानते या विशवास करते उनके लिये यह सारा विवरण निरर्थक है।