photographs of Pandit Deepak Maharaj's performance under SPIC MACAY
  • कथक की वेशभूषा में ही कथक की शुद्धता हैः पंडित दीपक महाराज
  • क्लासिकल नृत्य को लेकर एक्सपेरिमेंट नहीं होना चाहिएः पंडित दीपक महाराज
  • स्पिक मैके कार्यक्रम के तहत पंडित दीपक महाराज की प्रस्तुति

16 जनवरी, 2019। जयपुरः शब्दों का शोर तो एक तमाशा है मौन ही नृत्य की सही परिभाषा है। छात्राओं के बीच उनसे रूबरू होते हुए पंडित दीपक महाराज ने इन्हीं शब्दों के ज़रिए कथक को परिभाषित किया। मौका था आई आई एस (डीम्ड टु बी विश्वविद्यालय) की ओर से इंटरनेशनल स्कूल आॅफ इन्फाॅर्मेटिक्स एंड मैनेजमेंट, टेक्निकल कैम्पस में बुधवार को आयोजित स्पिक मैके कार्यक्रम का जिसके तहत पंडित दीपक महाराज प्रस्तुति देने के लिए उपस्थित हुए थे।

पंडित दीपक महाराज का कहना था कि कथक के स्तर को अगर किसी ने ऊंचा किया है तो वों हैं उनके पिता व गुरू पंडित बिरजु महाराज। इन्होंने कहा कि क्लासिकल वही सीख सकता है जिसके मन में धैर्य है। छात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में पंडित दीपक महाराज ने कहा कि वो आज के युग में जिस तरह से किसी भी गाने पर कथक डांस हो रहा है उसके सख़्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि ऐसे में कथक की शुद्धता भंग होती है। इन्होंने अपने पिता बिरजु महाराज जी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब भी उन्हें कोई बाॅलीवुड फिल्म आॅफर होती थी तो वो उसके सीन, एक्ट्रेस की वेशभूषा के बारे में अवश्य पूछते थे और यही कारण है कि बाॅलीवुड में उनके काम की आज भी कद्र होती है चाहे वो देवदास का ढ़ाई शाम रोक लई हो या फिर बाजीराव मस्तानी का मोहे रंग दो लाल हो।

स्पिक मैके यानि सोसायटी फाॅर प्रमोशन आॅफ इंडियन क्लासिकल म्यूज़िक एंड कल्चर अमंग यूथ एक स्वयंसेवी संगठन है जिसकी शुरूआत प्रो किरण सेठ द्वारा हुई। स्पिक मैके का उद्देश्य आज के युवा वर्ग को भारतीय पारम्परिक संगीत, नृत्य व संस्कृति से उसके मूल रूप में परिचित कराना है जिससे वे अपनी गौरवपूर्ण संस्कृति एवं समृद्ध कलाओं की महिमा को पहचानें एवं आत्मसात करें।

कत्थक प्रस्तुति में पंडित दीपक महाराज का तबलावादन पर साथ दिया श्री प्रांशु चतुरलाल ने, वोकल एवं हारमोनियम पर जनाब गुलाब वारिस थे वहीं सारंगी पर थे जनाब मोहम्मद आयूब।

कत्थक के पर्याय श्री बिरजु महाराज के शिष्य एवं पुत्र पंडित दीपक महाराज का उद्देश्य न केवल छात्राओं को कत्थक नृत्य की बारीकियों से अवगत कराना था बल्कि कत्थक की विभिन्न विधाओं को बेहद सरल रूप में छात्राओं से रूबरू कराना भी था तभी तो पंडित दीपक महाराज ने मुद्राओं एवं भावभंगिमाओं के ज़रिए बड़ी सरलता से लोहपथगामिनी यानि की ट्रेन का चलना, जीवन का चक्र आदि समझा दिया।

इसके साथ ही पंडित दीपक महाराज ने कत्थक की विधा टुकड़ा प्रस्तुत किया तत्पश्चात् मशहूर 16 चक्कर, तिहाईयां पेशकर छात्राओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। माखन चोरी के गद्यभाव ने तो एक ऐसा समां बांधा कि सभी छात्राएं इस नृत्य से जुड़ती हीं चली गईं।

ढ़ाई शाम रोक लई पर अपनी कला का प्रदर्शन कर महुआ शंकर ने पूरे माहौल का सांस्कृतिक एवं सूफियाना रंग में रंग दिया। अंत में घुंघरू और तबले की झेड़झाड़ समझी जाने वाली जुगलबंदी ने तो सबकी खूब वाह वाही बटौरी।

छात्राओं से रूबरू होते हुए पंडित दीपक महाराज ने कहा कि कथक की शुरूआत ही पुरूषों से हुई थी मुग़लों के आने के बाद महिलाओं की एंट्री हुई लेकिन अब सिर्फ महिलाएं ही कथक करती हैं पुरूषों की संख्या न के बराबर हो चुकी है।