हमारी हिन्दू(सनातन)धर्म में आश्रम व्यवस्था में गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। एक खुशहाल घर-संसार अधिकांश व्यक्तियों का सपना होता है। लेकिन कभी कभी किसी जन्म पत्रिका मे ऐसी ग्रह स्थितियों का निर्माण हो जाता है जिनसे मनुष्य अपने गृहस्थ जीवन से विरक्त व विमुख होकर अध्यात्म के पथ पर अग्रसर हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को हमारे समाज में ‘साधु-संन्यासी’ कहा जाता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि किसी भी जातक की कुंडली में पंचम भाव से ईश्वर, प्रेम और नवम भाव से धर्म विषयक अनुष्ठान आदि का विचार किया जाता है। जब नवमेश एवं पंचमेश में अर्थात भक्ति एवं अनुष्ठान दोनों में शुभ सम्बन्ध हो तो जातक उच्च श्रेणी का साधक बनता है ।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शनि चिंतनशील, गहराइयों में जाने वाला, योगी, संन्यासी एवं खोज करने वाला ग्रह है। शनि के साथ सूर्य जो नवग्रहों में राजा एवं अग्नि तत्व ग्रह है एवं मानव शरीर संरचना का कारक है, राहु जो शनि के समान ही ग्रह है, शनि के साथ सूर्य, राहु पृथकता जनक प्रभाव रखते हैं। इनमें से कोई दो ग्रह जिस भाव आदि पर निज प्रभाव डाल रहे हों तो उस भाव से पृथकता हो जाती है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि किसी भी जातक की कुंडली में लग्न, द्वितीय (कुटुंब भाव), चतुर्थ (सुख भाव), सप्तम (काम रति) व द्वादश (भोग) भाव व भावेशों एवं चंद्रमा पर शनि, सूर्य या राहु का प्रभाव होने से संसार के भोगों से जातक को विरक्ति हो जाती है। चंद्रमा के साथ शनि हो या दृष्टि संबंध हो या प्रभाव पड़ता हो तो जातक के मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।

फलदीपिका के अनुसार जब चंद्रमा शनि के द्रेष्काण में स्थित हो तथा उसे मंगल व शनि देख रहे हो या चंद्रमा मंगल के नवांश में हो उस पर शनि की दृष्टि हो तो संन्यासी योग बनता है।

ज्योतिषग्रंथ बृहज्जातक के अनुसार चार ग्रहों में अगर गुरु अधिक बलवान होता है तो व्यक्ति संन्यासी बन जाता है। चन्द्रमा के बलवान होने पर व्यक्ति कपाली होता है। सूर्य बलवान होने पर व्यक्ति कंद, मूल और फलों का सेवन करने वाला तपस्वी बन जाता है।

चंद्रमा जिस राशि में स्थित हो उस राशि के स्वामी को शनि देखता हो तथा अन्य कोई ग्रह नहीं देखता हो तो जातक दीक्षा अवश्य लेता है।

गृहस्थ जीवन के लिए जो ग्रह प्रमुख रूप से उत्तरदायी होते हैं, वे हैं- द्वितीयेश, चतुर्थेश, द्वादशेश, शुक्र व चन्द्र।

जन्म पत्रिका में दूसरा भाव कुटुम्ब व परिवार का होता है, चतुर्थ भाव घर-गृहस्थी एवं द्वादश भाव शैयासुख व भोग-विलास का। वहीं शुक्र भोग-विलास का नैसर्गिक कारक होता है एवं चन्द्र मन का कारक होता है।

दसम स्थान को कर्म स्थान कहते हैं । इसलिए पंचमेश , नवमेश अथवा दसमेश से सम्बन्ध हो तो फल में उत्कृष्टता आ जाती है ।

शनि एक न्यायकारी ग्रह है । य़ह जातक की कठिन परीक्षा लेकर उसके विचारों को शुद्ध और पवित्र कर देता है . शनि का समबन्ध नवम, पंचम या नवमेश या पंचमेश से हो तो जातक तपस्वी बनता है।

शनि नवम स्थान में हो उस पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो ऐसा जातक राजा होने पर भी सन्यासी होता है, और कभी कभी सन्यासी होने पर भी राजतुल्य हो जाता है।

चन्द्रमा नवम स्थान में हो और किसी भी ग्रह से दृष्ट न हो तो राजयोगादी रहते हुए भी सन्यासियों में राजा के सामान होता है।

चन्द्र-मंगल एक राशी में हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तो जातक सन्यासी होता है।

शनि और वृहस्पति साथ होकर नवम या दसम में उपस्थित हों और एक ही नवमांश में हो तो जातक सन्यासी बनता है ।

जब किसी जातक की जन्म कुंडली में चार , पांच , छह या सात ग्रह एकत्रित होकर किसी एक राशी में बैठें हों , तो ऐसा जातक सन्यासी होता है . परन्तु इन सब ग्रहों में एक ग्रह का बलि होना आवश्यक है. केवल चार या चार से अधिक ग्रहों के एकत्रित होने सन्यास योग नही बनता है।
उनमें से एक ग्रह का दशमेश या दशम से सम्बन्ध होना तथा एक ग्रह का बलवान होना जरुरी है।

कुंडली में धर्म त्रिकोण ( लग्न , पंचम और नवम ) तथा मोक्ष त्रिकोण ( चतुर्थ , अष्टम और द्वादश ) की स्वामियों का सम्बन्ध जातक को जीवन में आधात्मिक उन्नति की ओर ले कर जाता है। यह योग जन्म लग्न और चंद्र लग्न दोनों से देखा जाना चाहिए।

यदि इनमें से 4 या अधिक ग्रह षष्ठ, अष्टम या द्वादश जैसे अशुभ भावों में स्थित हों एवं इनमें अधिकांश ग्रहों पर शनि-राहु जैसे पृथकतावादी ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य का मन घर-परिवार से विमुख होता है। यदि इन ग्रहों से जन्म पत्रिका में चतुर्ग्रही योग का निर्माण हो व इस युति पर केतु का प्रभाव हो तो मनुष्य उच्च कोटि का संन्यासी व मठाधीश होता है।

सूर्य और गुरु की युति धार्मिक स्थानों में सेवा करने या पूजा स्थलों के निर्माण का एक अति महत्वपूर्ण ज्योतिषीय योग है। यह योग मकर लग्न की स्वामी प्रभुपाद जी की कुंडली में था जिन्होंने पिछली सदी में अनेक राधा-कृष्ण मंदिरों का विश्वभर में निर्माण करवाया।

सूर्य प्रव्रज्या कारक हो तो जातक वन, पर्वत या नदी किनारे आश्रम में धूनी रमाकर रहता है. सूर्य गणेश व शक्ति का उपासक व ब्रह्मचारी बनाता है।

चन्द्रमा प्रव्रज्या कारक हो तो जातक श्रावक, एकांतवासी एवं देवी भक्त होता है।

केतु और गुरु यदि कुंडली में एक साथ हों कर पंचम या नवम भाव से सम्बन्ध बनायें तो व्यक्ति मन्त्र साधना में प्रवीण होता है। इस योग में यदि जन्म लग्न या कारकांश लग्न से त्रिकोण में पाप ग्रह हों तो जातक तंत्र साधना की ओर भी जा सकता है।

मंगल प्रव्रज्या कारक हो तो जातक बौद्ध धर्म का उपासक , गेरुवा वस्त्रधारी , जितेन्द्रिय, भिक्षावृति लेने वाला सन्यासी होता है ।

वृहस्पति प्रव्रज्या कारक हो तो जातक भिक्षुक, दंडधारी, तपस्वी, धरम शास्रों के रहश्य को खोजने वाला , ब्रह्मचारी, तथा गेरुवा वस्त्रधारी होता है।

शुक्र प्रव्रज्या कारक हो तो जातक वैष्णव धर्म परायण , व्रतादि करने वाला सन्यासी होता है. भक्ति द्वारा अर्थ साधना उसका लक्ष्य होता है।

शनि प्रव्रज्या कारक हो तो जातक दिगंबर, निर्वस्त्र रहने वाला , फ़कीर और कठोर तपस्वी होता है।

चार या चार से अधिक ग्रह एक राशी में एकत्रित होने पर सन्यास प्रवृति होती है. लग्न एवं चंद्रमा से मनुष्य के शरीर एवं मन का विचार होता है।

जब लग्न व चन्द्रमा का सम्बन्ध जब शनि से हो तो जातक सन्यासी होता है।

यदि लग्नाधिपति पर किसी ग्रह की दृष्टि शनि पर हो तो सन्यास योग बनता है. शनि पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो तथा शनि की दृष्टि लग्नधिपति पर पड़ती हो तो सन्यास योग होता है. शनि की दृष्टि निर्बल लग्न पर पड़ती हो , चन्द्र रशिपति अर्थात जन्म कालीन चन्द्रमा जिस राशी में हो उसके स्वामी पर किसी गृह की दृष्टि न हो परन्तु राशिपति पर शनि की दृष्टि हो तो ऐसा जातक को शनि अथवा राशिपति में जो बली हो उसकी दशा, अन्तर्दशा में सन्यास योग होता है।

जन्म राशी निर्बल हो , उस पर बलि शनि की दृष्टि हो तो सन्यास योग बनता है।

चन्द्रमा शनि के प्रभाव में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो अथवा चन्द्रमा शनि अथवा मंगल के नवमांश में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो सन्यास योग बनता है।

कुछ सुप्रसिद्ध (मुख्य) सन्यासियों की जन्म कुंडलियां-

श्री अरविंदो की कुंडली का योग
पंचमेश और नवमेश की युति व्यक्ति को ज्ञान मार्ग से चेतना के विकास की ओर ले कर जाती है। श्री अरविंदो की कर्क लग्न की कुंडली में पंचमेश मंगल और नवमेश गुरु की लग्न में बन रही युति ने उन्हें एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक चिंतन और लेखक बनाया।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कुंडली में था यह योग
चन्द्रमा यदि शनि या मंगल के द्रेष्काण में होकर मात्र शनि से दृष्ट हो तो भी जातक संन्यासी हो सकता है। यदि चन्द्रमा शनि या मंगल के नवांश में हो कर शनि से दृष्ट हो तब भी संन्यास योग बनता है। यह योग स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कुंडली में बन रहा था।

ओशो और गौतम बुद्ध की कुंडली में था यह योग
यदि जन्म कुंडली में चार या चार से अधिक ग्रह किसी भाव में एकत्र हों तो प्रबल संन्यास योग बनता है। इस योग में यदि कोई ग्रह सूर्य से अस्त न हो तथा दशमेश भी इस योग में सम्मलित हो जाए तो जातक विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक व्यक्ति हो सकता है।

भगवान गौतम बुद्ध की कर्क लग्न की कुंडली में दशम भाव में पांच ग्रह संन्यास योग निर्मित कर रहे थे। आचार्य रजनीश (ओशो ) की वृषभ लग्न की कुंडली में अष्टम भाव में पांच ग्रह मिल कर संन्यास योग बना रहे थे। इन दोनों महापुरुषों की कुंडली में दशमेश भी इस संन्यास योग में सम्मिलत था।