world arthritis day

हमारे देश भारत में हर छठा व्यक्ति आर्थराइटिस या गठिया से पीड़ित हैं तथा देश में कुल आर्थराइटिस रोगियों की संख्या 15 करोड़ हैं जिनमे से 4 करोड़ लोगो को घुटने बदलवाने की जरूरत हैं.घुटने की आर्थराइटिस शारीरिक विकलांगता के प्रमुख कारण के रूप में उभर रही है.आर्थर्राइटिस की समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक सामान्य है.

पालथी मारकर बैठना घुटने की आर्थराइटिस का सबसे बड़ा कारण

हमारे देश में लोग पूजा करने, खाना खाने, खाना बनाने, बैठने आदि के दौरान पालथी मारकर बैठते हैं. इसके अलावा परंपरागत शैली के शौचालयों में घुटने के बल बैठने की जरूरत होती है.अर्थराइटिस के लिए हमारी जीवन शैली भी जिम्मेदार है, जिसके तहत उठने-बैठने में घुटने की जोड़ का अधिक इस्तेमाल होता है. इस कारण शरीर के अन्य जोड़ों की तुलना में घुटने जल्दी खराब होते हैं.

शरीर के किसी भी जोड़ में दर्द और जकड़न और जोड़ों से आवाज आना आर्थराइटिस के शुरुआती लक्षण हैं. बाद के चरणों में चलने-फिरने में कठिनाई होती है और जोड़ों में विकृतियां भी आ सकती हैं.

मौजूदा समय में जंक फूड एवं फास्ट फूड के बढ़ते इस्तेमाल तथा खान-पान की गलत आदतों के कारण शरीर की हड्डियों को कैल्शियम एवं जरूरी खनिज नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे कम उम्र में ही हड्डियों का घनत्व कम होने लगा है. हड्डियां घिसने और कमजोर होने लगी हैं. गलत खान-पान एवं जीवन शैली के कारण युवाओं में आर्थराइटिस एवं ओस्टियो आर्थराइटिस की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है. आज देश में घुटने की आर्थराइटिस से पीडित लगभग 30 प्रतिशत रोगी 45 से 50 साल के हैं, जबकि 18 से 20 प्रतिशत रोगी 35 से 45 साल के हैं.

आर्थराइटिस से कैसे करें बचाव

आर्थराइटिस से बचाव के लिए पैर मोड़कर बैठने से बचें, आलथी-पालथी मार कर नहीं बैठें, भारतीय शौचालयों का उपयोग जहां तक हो सके, कम करें तथा लंबे समय तक खड़े होने से बचें. घुटने की आर्थराइटिस की आरंभिक अवस्था में घुटने के व्यायाम, साइकल चलाना और तैराकी रोग को बढ़ने से रोकने का सबसे बेहतर तरीका है. इसके अलावा हमें दूध एवं अन्य डेयरी उत्पादों और मौसमी फलों और सब्जियों का सेवन करना चाहिए तथा विटामिन डी की कमी से बचने के लिए पर्याप्त समय तक धूप में रहना चाहिए.

नोएडा स्थित फोर्टिस हॉस्पीटल के आर्थोपेडिक एवं ज्वाइंट रिप्लेसमेंट विभाग के निदेशक डॉ. अतुल मिश्रा बताते ने कहा, “हमारे देश में घुटने की आर्थराइटिस का प्रकोप चीन की तुलना में दोगुना तथा पश्चिमी देशों की तुलना में 15 गुना है और इसका कारण यह है कि भारतीय लोगों में जेनेटिक एवं अन्य कारणों से घुटने की आर्थराइटिस से पीड़ित होने का खतरा अधिक होता है.”

डॉ. अतुल मिश्रा ने कहा कि जब घुटने के जोड़ बहुत अधिक खराब हो जाते हैं और मरीज का चलना-फिरना दुभर हो जाता है, तब घुटने को बदलने की जरूरत पड़ती है, जिसे टोटल नी रिप्लेसमेंट कहा जाता है. यह एक बहुत ही सफल प्रक्रिया है जो आधी सदी से भी अधिक पुरानी है. इसकी सफलता दर 95 प्रतिशत है और इससे रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आता है.

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